पीली छतरी वाली लड़की और भूमण्डलीकरण
हीना शुक्ला1, डाॅ. रमेश अनुपम2
1शोध छात्रा, शासकीय दू.ब. महिला स्नाताकोत्तर, महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2शोध निर्देशक, सहायक प्राध्यापक, शासकीय दू.ब. महिला स्नाताकोत्तर महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
आधुनिक साहित्य की समस्त विधाओं में कहानी अपनी कलात्मक कामनीयता सहजाकर्षण शक्ति, मनोरंजकता एवं प्रभाविष्णुता से संपन्न एक श्रेष्ठ सर्वाधिक लोकप्रिय एवं अन्यतम् स्थान की अधिकारणी विधा है। कहानी दशक-दशक पर नई उॅंचाई को छूते हुए विकास, परिर्वतन और स्वरूप को आज वर्तमान समय में प्रस्तुत किया है। कहानी की इसी काल क्रम में आठवें दशक में उदयप्रकाश की कहानी जैसे शाश्वत रचनाकार का नाम सामने आता है जो अपनी कहानियों में समकालीन यथार्थ और समकालीन नवयथार्थ का चित्रण बखूबी रूप से कहानियों में प्रस्तुत किया है।
पीली छतरी वाली लड़की, भूमण्डलीकरण
आधुनिक साहित्य की समस्त विधाओं में कहानी अपनी कलात्मक कामनीयता सहजाकर्षण शक्ति, मनोरंजकता एवं प्रभाविष्णुता से संपन्न एक श्रेष्ठ सर्वाधिक लोकप्रिय एवं अन्यतम् स्थान की अधिकारणी विधा है। कहानी दशक-दशक पर नई उॅंचाई को छूते हुए विकास, परिर्वतन और स्वरूप को आज वर्तमान समय में प्रस्तुत किया है। कहानी की इसी काल क्रम में आठवें दशक में उदयप्रकाश की कहानी जैसे शाश्वत रचनाकार का नाम सामने आता है जो अपनी कहानियों में समकालीन यथार्थ और समकालीन नवयथार्थ का चित्रण बखूबी रूप से कहानियों में प्रस्तुत किया है। उदयप्रकाश ऐसे रचनाकार हुए जिसे अपने कार्य की गहरी समझ थी, वे देश दुनिया में हो रहे परिर्वतन को जानते, पहचानते और समझते थे। 1
उदयप्रकाश लंबी कहानी ‘पीली छतरी वाली लड़की’ का प्रकाशन सन् 2001 में हिंदी के सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘हंस’ में प्रकाशित होते ही साथ हिन्दी पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया, चारों ओर इस कहानी की चर्चा होने लगी। इस कहानी की सबसे प्रमुख विशेषता यह थी की यह कहानी अंर्तवस्तु और शिल्प की दृष्टि से समकालीन हिंदी कहानी से काफी भिन्न थी। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ कहानी में लेखक ने एक प्रेम कथा को समकालीन जटिल यथार्थ के ताने-बाने के साथ इस प्रकार बना है कि वह कहानी केवल एक प्रेम कथा की कहानी बनकर नहीं रह जाती, वरन् हमारे समय की जटिल यथार्थ प्रतिबिम्बन भी बन जाती है।
इस कहानी में अंजली जोशी नायिका है और नायक है राहुल। राहुल हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से एम.ए. कर रहा है। वह विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहता है। जहाॅं उसके अनेक मित्र उसके साथ हास्टल में रह रहे है। सापाम, नीरा, ओ.पी., अणिमा, दीप्ति, मनमोहन, आभा, कार्तिकेय काजले है। जब राहुल पहली बार अंजली को देखता है तो वह अंजली के प्रति आकर्षित हो जाता है। वह अंजली के निकट बने रहने के लिए अपना विषय छोड़कर एम.ए. हिन्दी में प्रवेश ले लेता है। राहुल अंजली से प्रेम में इस कदर डूब चुका है कि उसे अंजली के बगैर कुछ अच्छा नहीं लगता है। उदयप्रकाश चाहता तो इस कहानी को महज प्रेमकहानी बनाकर अपने लेखकीय दायित्व से मुक्त को सकता था, लेकिन 20 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के ऐसे सचेत एवं सजग लेखक है, जो समय की जटिलताओं को बखूबी जानते है। समकालीन जीवन यथार्थ से टकराये बिना किसी भी रचना का सृजन असंभव है, इसलिए उनकी अधिकत्तर कहानी समकालीन यथार्थ को आवारा पूंजी के उस दौर को कथा के माध्यम से प्रस्तुत करती है।
पीली छतरी वाली लड़की’ में अंतर्वस्तु की बनावट में उदयप्रकाश ने काफी सावधानी बरती है। इसलिए यह कहानी अपनी बनावट में सरल और सहज है। अंतर्वस्तु में लगभग हर जगह स्थान-स्थान पर उदयप्रकाश ने कथा के साथ-साथ क्षेपक के रूप में नवयथार्थवाद से चित्रित करने का प्रयास किया है। हमारा समकालीन नवयथार्थ बहुस्तरीय है। इस बहुस्तरीय नव्ययथार्थवाद को बखूबी समझते हंै। इसलिए ये ‘पीली छतरी वाली लड़की’ मंे उदयप्रकाश ने एक स्थाप पर लिखा है ”ये लोग मान ही नहीं सकते कि अभी भी हिंदुस्तान में ऐसे लोग बचे हुए है, जिन्हें दौलत नहीं चाहिए और वे अमेरिका या फं्रास व्यापार करने नहीं, अकादमिक या दूसरे कारणों से जाते हैं। तो क्या ये जो भूमंडलीकरण हो रहा है यह उन्ही के लिए है जो विश्व बाजार के हिस्से हैं, सटोरियों, व्यापारियों, तस्कर, अपराधी या सरकारी मंत्री अफसर है।“ 2
पीली छतरी वाली लड़की’ कहानी में एक स्थान पर लिखते है कि ” दिस इज द एंड आॅफ द सिविल सोसायटी अब कहीं कोई नागरिक, समाज नहीं बचा, सिर्फ सरकारें हैं, कंपनियां है, संस्थाएं है, माफियां और गिरोह है, और अगर हम भी तुम किसी कवि, विद्वान को हवाई जहाज में सवार होकर विदेश जाते देखते हो तो जान लो वह किसी कंपनी, किसी व्यापरी, संस्थान या गिरोह का सदस्य या दलाल हैं, आलवेज आउट हिज इंटीग्रिटी।“ 3
इस लंबी कहानी की अंतर्वस्तु में उदयप्रकाश अपने समय की हर अनुगूंज को पकड़ लेना चाहते है, वे बारीक से बारीक घटना को भी कहानी की अंतर्वस्तु में पिरों लेना चाहते है। जिसे कहानी को प्रभावशाली बनाया जा सके। एक तरफ से देखा जाएं तो उदयप्रकाश एक अद्भूत पे्रमकथा को आवारापूंजी के इस दौर के साथ रखते चलते है।
आवारापूंजी के इस दौर को भी वे अपनी इस कहानी में इस तरह रखते हैं ”तो वह समय था जब इंडिया के बाजारों में तरह-तरह के परफ्यूम, कास्मेटिक, साफ्ट डिंªक्स एलेक्ट्रिक्लस एवं एलेक्ट्रानिक, गजेट्स, वाशिंग मशीन, सेलुलर फोन, डिजिटल टीवी, हैंडी कैम पडे़ थे। हर हफ्ते आधा दर्जन कारों के नये माॅडल सामने आ रहे थे, दिल्ली में मेक्डोनाल्ड, केएफसी और निरूलाज के सैक्र्ड़ों इंटिग ज्यायंट खुल रहे थे, राजधानी और दूसरे बडे़ शहरों में नाइट क्लब्स खुल गये थे, जहाॅं रात में माडल्स व्हिस्की और वाइन बेचती थी और जहां मंत्रियों-नौकरशाहों और अपराधियों की संताने ऐश करती थीं। देशी विदेशी सट्टेबाज खुले आम लोागों में जुए और लाटरी डालकर उन्हें करोड़पति बनाने का स्वप्न दिखा रहे थे। एक दिन इस देश के मंत्री और नौकरशाह जितने का लंच कर जाते थे, सिर्फ उतने रूपयों में सारे गाॅेवों मंे पीने का पानी, स्कूलों में अध्यापन और ब्लैकबोर्ड, खेतों में घरों में बिजली और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने के लिए हगने मूतने का शौचालय लग सकता था।“
उदयप्रकाश की भाषा एक तरह से दृश्य एवं बिम्ब प्रधान भाषा है। वे अपनी इस कथा में प्रतीकों और बिम्बों का इस प्रकार प्रयोग करते हैं जिससे कथा सजीव हो उठती है। उदयप्रकाश की काव्यात्मक भाषा का एक उदाहारण यह भी है - ”सुबह आकाश में बादल नहीं थे। बहुत दिनों के बाद नया-धूला चमकीला सूरज निकला था राहुल के कमरा नं. 252 की खिड़की के एक कोने से तिरछी नारंगी किरणें कूदकर उसके बिस्तर पर गिरकर गौरैया फुदक रही थी।“4
उदयप्रकाश की कहानी ‘पीली छतरी वाली लड़की’ भूमण्डलीकरण के इस दौर की कहानी है। भूमण्डलीकरण के इस दौर को उत्तर आधुनिकता के इस समय को उदयप्रकाश हर बार अपनी कहानी में पिरोते चले जाते है। भूमण्डलीकरण किस प्रकार भारतीय समाज और संस्कृति में प्रभावित कर रहा है इसे उदयप्रकाश अपनी इस कहानी में बताते चलते हैं-”तो यह वह उत्तर आधुनिक समय है जब छोटे-छोटे शहरों में वेलेंटाइन डे मनाया जा रहा है और न्यू ईया के लिए भुच्य पिछड़े कस्बों में टी.वी. विज्ञापनों की बदौलत केक और आर्चीज के कार्ड की बिक्री बढ़ गयी है।“ 5
भूमण्डलीकरण के विषय में दुर्भाग्य जनक यह है कि समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र तीसरी दुनिया के देशों में केवल बाजार की तलाश नहीं करते वरन् वहां की राजनीति, अर्थनीति, संस्कृति आदि को भी अपने स्वार्थ के लिए प्रभावित करते है। अगर नोआम चोमस्की, जैसे विचारक की बात पर यकीन करंे तो ये समृद्ध देश अपने स्वार्थ के लिए तीसरी दुनिया के देशों का इस्तेमाल अपनी सामरिक शक्ति को बढ़ाने के लिए गैस, खनिज, तेल आदि पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए भूमण्डलीकरण जैसे शब्द का आश्रय लेते है। ‘पीली छतरी वाली लड़की’ में उदयप्रकाश भूमण्डलीकरण के इसी नये विमर्श को अपनी कहानी में प्रस्तुत करते हैं और बताते हैं कि किस तरह भारत जैसा देश भी उसके चपेट में हैं। वे इस कहानी का प्रारंभ में नखलानी जैसे चरित्र की रचना करते हैं जो सीधे प्रधानमंत्री को फोन करके करके आदेश देता कि सारी संस्था का निजीकरण करों। पब्लिक सेक्टर को बेचो। यह भूमण्डलीकरण नया विमर्श है। एक ऐसा विमर्श जिसकी चर्चा जानबूझकर नहीं की जाती है।
भूमण्डलीकरण के समर्थक पूंजीपतियों के लाभ के लिए सार्वजनिक उपक्रम बंद कर सारी सार्वजनिक संस्थाओं को पूंजीपति के हाथों में सौंप देने की बात कही जाती है। भूमण्डलीकरण के समर्थकों को सहकारी या सहकारी संस्थान में कोई रूचि नहीं है। वे इस सब बंद कर देना चाहते है। ताकि देशी व विदेशी पूंजीपति ज्यादा से ज्यादा से लाभ कमा सके। कहानी के प्रारंभ में उदयप्रकाश नखलानी जैसे चरित्र के माध्यम से यह प्रदर्शित करते है कि भूमण्डलीकरण का एक नया विमर्श कितना क्रूर और जघन्य है। वे भूमण्डलीकरण को इस नए विमर्श के साथ परिचय करते हुए कहते है कि भारतीय किसानों को मिलने वाली सब्सिडी बंद करवा देनी चाहिए। अगर किसान मरते हैं तो उसकों उसी हाल में छोड़ देना चाहिए।
यहां इस कहानी में प्रधानमंत्री नखलानी से फोन में बातें करते हुए कह रहे है कि ”हो जाएंगी नखलानी जी। वो आयज इंपोर्ट करने दिया था। इसलिए सोयाबीन, सूरजमुखी और तिलहन की खेती करने वाले पहले से बर्बाद है। उसके बाद सब्सिडी हटा दे तो बवाल हो जाता इसके उत्तर में नखलानी कहता है- जल्दी करो मरने दो साले किसानों को।“ यह भूमण्डलीकरण का विकृत चेहरा है जिसमें किसानों और मजदूरों कि कोई चिंता नहीं है। किसानों को मिलने वाले सब्सिडी को भी बंद करने की भी बातें होती है। 6
हिंदी और समकालीन भारतीय साहित्य में भूमण्डलीकरण और समकालीन विश्व परिदृश्य को समझने वाले लेखक कम है। उदयप्रकाश अकेले ऐसे लेखक है जिन्हंे विश्व परिदृश्य की भलिभांॅति समझ है। भूमण्डलीकरण शब्द की असलियत उदयप्रकाश अच्छी तरह पहचानते है। इस संदर्भ में विजय मोहन सिंह का यह कथन हैः- ”उदयप्रकाश आधुनिक कथा लेखन के विश्व परिदृश्य से पूरी तरह परिचित ही नहीं है, बल्कि उन्होंने उसे भालिभांति आत्मसात भी किया है। उनकी भाषा तथा तकनीक इतनी परिष्कृत है कि उसकी परिधि में इतिहास समाजशास्त्र, नैतिकशास्त्र सभी कुछ बडे़ कौशल से समाहित हो जाता है। विश्व कथा क्षेत्र में इस विशेषताएं हेमिंग्वे आदि कथा लेखकों के बाद आई। उदयप्रकाश चूंकि बहुपठित तथा सुविज्ञ है अतः वे बड़ी सजगता तथा सतर्कता से कहानियां लिखते है। वे कहानी सूक्ष्म ब्यौरों तथा उसके संवेदन पक्ष पर जितना ध्यान देते है, उतना ही उसे महज ब्यौरों तथा उसके ऐन्द्रिक पक्ष के क्षेत्र से निकालकर एक व्यापक सामाजिक संदर्भ देने भी। यह अद्भूत समन्वय उनकी कहानियां सही अर्थ में ‘शताब्दी के ढलान’ की कहानियां बनाता है जहां तिरक्ता, व्यंग्य, हताश तथा आक्रोश एक साथ व्यक्त होते है।“ 7
आज भारत में कालाबाजारी और भूमाफिया का प्रभाव दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। पैसा कमाने के लिए, जमीन हथियाने के लिए लोग जगह-जगह मंदिर बनाकर दो नंबर की कमाई कर रहे हैं। जनता रोज ठगी जा रही है। चिटफंड कंपनियाॅं खुलआम लूट रही है। सीधे-साधे नागरिकों की जिंदगी भर की कमाई को चूना लगाया जा रहा हे। किसान, बेरोजगार, नौजवान और प्रताड़ित औरते आत्महत्याॅं कर रहे है। जगह-जगह एन.जी.ओ. और पब्लिक स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे हे। अमीर बनने का जरिया व कालेधन की कमाई जगह-जगह भूमण्डलीकरण ने खूब सिखाये और फैलाये हैं।
पश्चिम के कुत्सित भोगवादी चेहरे और भारत की इनकी गुलामी मानसिकता को चिन्हित करते हुए ‘पीली छतरी वाली लड़की’ का एक चरित्र कार्तिकेय के गुस्से में कहता है- ”ये पश्चिम से सारी घटिया खतरनाक पत्तित और भोगवादी चीजें आयात चेहरे करेगें। जुआ, सट्टा, हथियार, केमिकल, ड्रिक्स, शराब, पिज्जा, कार...मजा, भोग, सुख, उन्माद और हिंसा का सारा माल ये उसके पीछे पागल हो चुके है। पश्चिम का सबसे उत्कृष्ट है ये उसे मिटा डालना चाहते हैं। ये उसके हत्यारें हैं, दुश्मन हैं।“
‘पीली छतरी वाली लड़की’ हमें भूमंडलीकरण का प्रमुख प्रभाव देखने को मिलता है कि किस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था एक विश्वविद्यालय में हावी हो गई है। विश्वविद्यालय किस तरह राजनीति का अड्डा बन चुका है, गंुडे, मवाली, हत्यारे सब विश्वविद्यालय में घुसकर वसूली कर रहे हे। विश्वविद्यालय अब ज्ञान के लिए नहीं तिकड़मों के लिए जाना जाता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनी और उद्योपतियों के जाल में किस तरह हमारे देश की राजनीति फंसती जा रही है। किस प्रकार युवा पीढ़ी अपने कर्तव्य को खो रही है। निजी क्षेत्र वाले किस प्रकार किसानों की भूमि, जमीनों को हथिया रहे है। समाज में कैसे भूमण्डलीकरण अपना प्रभाव स्थापित कर रहा है। किस प्रकार शिक्षा लक्ष्यहीन हो गई है। पूंजीवादी का तीव्र जहाज हमारे समाज में फैल चुका है। यह कहानी पृष्ठ दर पृष्ठ बताती और समझाती है।
उदयप्रकाश भूमण्डलीकरण की व्याख्या करते हुए आज की विशेष हुए आज की विशेष संदर्भ उसे जोड़कर देखने की कोशिश करते है। जब उन्हें यह प्रतीत होता है कि भूमण्डलीकरण केवल तीसरी दुनिया के देशों के शोषण के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले एक पूंजीवादी मुहावरा है, तब वे इसका विरोध करते हुए दिखाई देते है।
संदर्भ ग्रंथ सूचीः
1. वर्मा निलिमा, स्वातंन्त्रयोत्तर हिन्दी कहानी में नारी चरित्र का आधार, युनिर्वसिटी बुक हाऊस, जयपुर सन् 2004, पृष्ठ क्रं. सं. 01
2. उदयप्रकाश पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2001, पृष्ठ सं. 20
3. उदयप्रकाश पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2001, पृष्ठ सं. 21
4. उदयप्रकाश पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2001, पृष्ठ सं. 07
5. उदयप्रकाश पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2001, पृष्ठ सं. 22
6. उदयप्रकाश पीली छतरी वाली लड़की, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2001, पृष्ठ सं. 13
7. देसाई पारूकांत, साठोत्तरी उपन्यास, प्रकाशक चिंतन प्रकाशन कानपुर, प्रथम संस्करण 2002 पृ. सं. 372
Received on 03.08.2017 Modified on 11.09.2017
Accepted on 15.09.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(3): 181-184 .